न जाने किस नदी का घाट होगा कौन सा वह पाट होगा बैठे होंगे जाने-पहचाने कुछ लोग सूखे दरख़्त की छांव में….. व निरख रहे होंगे मेरी चिता को, और न जाने क्या-क्या भाव भीतर पालते होंगे जब धधक उठी होगी चिता मेरी सभी अपने-अपने हिस्से की लकड़ियाँ उस पर ...
भूख भयानक रोग मनुज पर अपनी सदा कहर बरपाती कृषक खेत में बीज डालता माँ उस दाने को चुन लाती ज्वालामुखी भूख के आगे कोई यहाँ न टिक पाता है श्वपच श्वान के संग बैठकर जहाँ ...
गिद्ध ! पर्यावरण का रक्षक स्वच्छ भारत अभियान का स्वयंसेवक किन्तु, खेतों में डाले गये फर्टिलाइजरों, कीटनाशकों व पालतू जानवरों को खिलाई गई दवाओं ने गिद्धों को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया तभी तो मानव दखल अंदाजी से दूर ऊंचे पर्वतीय दरख़्तों पर ...
कि खेले खून से होली बहुत विश्राम तो लो लहू से सिक्त कर धो कर भला कुछ काम तो लो गिरा दो जातियों के बीच की दीवार को तुम कि मंजिल तक पहुँचने का नया पैगाम तो लो कि मुट्ठी बाँध कर आये जरा तुम ख्याल कर लो पसारे कर विदा होगे इसे भी याद...