न जाने
किस नदी का घाट होगा
कौन सा वह पाट होगा
बैठे होंगे जाने-पहचाने कुछ लोग
सूखे दरख़्त की छांव में…..
व निरख रहे होंगे
मेरी चिता को,
और
न जाने क्या-क्या भाव
भीतर पालते होंगे

जब धधक उठी होगी चिता मेरी
सभी अपने-अपने हिस्से की लकड़ियाँ
उस पर डालते होंगे

देखते
बस देखते
मेरी चिता से
उठ रहीं नीली-पीली लपटें
निगल चुकी होंगी
मेरे पार्थिव शरीर को…….
अब
बोलो तुम्हीं
क्या बिन जले अक्षुण्ण
कुछ भी रह गया होगा ?

अजी हाँ
बस वही….!
आदमी का साहस भरा सत्कर्म !!
जो धधकती चिता से छिटक कर
ठहरा होगा
पास ही….
बुद्ध की तरह
यहीं पर कहीं

*** डॉ.मधेपुरी की कविता ***