Poem- Ujde Basere Men

रोते-बिलखते

दीखते हैं क्यों ?

हर बस्ती में

बेबस लुटे-पिटे ये लोग

कुचली-मसली कलियों की तरह

और मौत !

क्यों बन गई है –

इस मुल्क में करोड़ों की जिंदगी

टहनियों पर मुरझाये फूलों की तरह

और फिर

उजड़े बसेरे में –

करता है कोई

कर्मों का मूल्यांकन

कोई पश्चाताप की आग में

जलता नजर आता है

और कोई ज़ब्त गम में डूबे

दर्दे दिल को सहलाता है

तो कोई अंधेरी गलियों की खामोशी को

यह सुनाता है –

“ कह दो कोई अंधेरे से खाली करे खुदा का घर

जलेगा अब हरएक चिराग़ गीता और फातिहा पढ़कर |”

*** डॉ.मधेपुरी की कविता ***