Damini

मैं हूँ पूनम !
दामिनी की सहेली
लेकिन,
बचपन में ही मेरे माँ-बाप गुजर गये
मिड्ल पास कराकर नानी भी गुजर गई
और मामा !
बेरोजगार ‘घामू’ के साथ
पीले कर दिये मेरे हाथ
और दुनिया को जल्द ही
अलविदा भी कह दिये

साल लगा भी नहीं
कि घामू के पैर फिसलने लगे….
तेजी से बहकने लगे और भटकने भी लगे……
जल्द ही किसी रहस्यमय रोग के कारण
धरती को अलविदा भी कह गये
फिर अनायास
लोगों के मुंह से निकलने लगी आवाज…..!
‘घामू एड्स का शिकार तो नहीं हो गया ?’

यह अफवाह दूर-दूर तक फैलने लगी
फिर मनचलों की मदहोश नजरें
चांद जैसी पूनम पर कभी नहीं पड़ी
वह तो विधवा पेंशन पर ही गुजारा करने लगी
गर्मी-बरसात की रातों में भी
खिड़की-किवाड़ खोलकर सोने लगी
और अहर्निश उसकी सुरक्षा में लगी रही-
‘मृत पति के एड्स की अफवाह……!’

कुछ ही दिनों के बाद पूनम से मिलने
एक ‘आशा’ आती है
एड्स की जांच कराने पूनम को
किसी बड़े अस्पताल में ले जाती है
सघन जाँच के बावजूद
डॉक्टर को
कुछ नहीं मिल पाता है
फिर उस पाकीज़ा की आँखों में आँखें डाल
डॉक्टर उसे यही सुनाता है-

पूनम जी !
आप पूर्ण स्वस्थ हैं ……!!  इसे स्वीकार कीजिए !!!
परन्तु, यह सुनकर- पूनम उदास हो जाती है
उसकी हिरणी जैसी आँखें
आसुओं से तर हो जाती है
लेकिन,
वह खुद को संभाल लेती है
और डॉक्टर से यही कहती है- भैया !
मेरे लिए ‘एड्स का शिकार’ कहा जाना
दामिनी को लगे ‘दाग’ से कहीं अच्छा है
शरीर का गहरा जख्म, आत्मा के घाव से कहीं अच्छा है

यह ‘अफवाह वाला एड्स’ मुझको
मानव पशुओं से, दरिन्दों से बचाता है
मैं हाथ जोड़ती हूँ, आपके पाँव पड़ती हूँ –
मेरे तिनके के भरोसे को, मुझसे कभी मत छीनिए……!
ताजिंदगी इस रिपोर्ट को-

‘गोपनीय ही रहने दीजिए  !!’

*** डॉ.मधेपुरी की कविता ***