खून की दरिया में डूबी
इंसानियत की किश्ती
उजाले में भी बस्ती पर –
है सन्नाटा ! है खामोशी !!
मगर आवाज आती है
मुर्दों की बस्ती से-
ना हम हिंदू हैं और ना मुसलमान
हम हैं इसी मुल्क की संतान
तो फिर क्यों-
नफरत की खेती से उपज रही
मौत की फसलें !
और
कलंकित हो रही नाहक
राम रहीम की नस्लें !!
*** डॉ.मधेपुरी की कविता ***