बच्चों के जन्म लेने पर ना जाने कब से बधैया लोकगीत व लोकनृत्य के जरिये अशीम आशीष के साथ उन्हें संस्कारित किया जाता रहा है जबकि वर्तमान समय में फैशन परस्तों ने “हैप्पी बर्थ डे टू यू” को अपना कर परंपराओं में भारी फेरबदल कर दिया है । सब कुछ अपने स्थान से खिसक कर खड़ा हुआ दिखने लगा है चाहे भगवान बुद्ध के ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ का सपना हो या डॉ.लोहिया के विश्व सरकार बनाने की परिकल्पना या फिर समाजवादी चिंतक भूपेन्द्र नारायण मंडल के हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश को मिलाकर फेडरल स्टेट्स निर्माण की कल्पना ही क्यों ना हो……!

आजकल डीजे और पॉप संगीत के धूम-धड़ाके के साथ बच्चों के जन्मदिन पर नई पीढ़ियों के द्वारा भावहीन उत्सव मनाया जाता है……. तभी तो नई पीढ़ी के लोगों के बीच भावों की शुष्कता एवं मनोभावों की मूल्यहीनता का एक छोटा सा पौधा उगना शुरू हो गया है।

अस्तु , सांस्कृतिक विरासत में हो रहे क्षरण से निजात पाने के लिए सशक्त प्रयास की जरूरत है……। जब पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी के बीच की दीवार टूट सकती है….. या फिर कई यूरोपीय देशों द्वारा अपने करेंसीओं का परित्याग कर एकमात्र यूरो को स्वीकार कर एकता का परिचय दिया जा सकता है तो फिर हिंदुस्तान-पाकिस्तान कब तक अपने ही भाइयों के खून से अपने-अपने हाथों को रंगता रहेगा….?

हम लहू से सिक्त हाथों को धोकर इंसानियत को जिंदा रखने का उपाय क्यों नहीं करते ? जबकि हम भलीभांति यह जानते हैं कि अच्छा वक्त उसी का गुजरता है जो किसी का बुरा नहीं सोचता…… बल्कि हमेशा सकारात्मक सोच में डूबा रहता है बिल्कुल वैसे जैसे शायर मो.अजमल पूरी संवेदना के साथ हमें यह गीत सुनाता है-

मुसलमान और हिन्दू की जान

कहाँ है….. मेरा हिंदुस्तान

मैं उसको ढूंढ रहा हूं

मेरे बचपन का हिंदुस्तान

न बांग्ला देश ने पाकिस्तान

मेरी आशा मेरे अरमान

वो पूरा-पूरा हिंदुस्तान मैं उसको ढूंढ रहा हूं……मैं उसको ढूंढ रहा हूं

*** डॉ.मधेपुरी की बातें ***