अभावों में रहकर दिया माँ ने जन्म बेटे को
पिता का प्रयास कि चलना सिखाया जल्द बेटे को
जीने लगे माँ-बाप ले भर अरमान मस्ती में
बड़ा होकर यही बेटा करेगा नाम बस्ती में
यही सब सोचकर दोनों उठाते बोझ कन्धे पर
मगर बेटा भटक जाता, असर होता न अन्धे पर
इधर माँ-बाप का दिल काँच जैसा टूटने लगता
उधर बेटा पढ़ाई छोड़कर ‘बस’ लूटने लगता
कभी देखा किसी अखबार में तसवीर बेटा की
पिता ने मान ली होगी किसी दुर्दान्त नेता की
माँ बोलती देखो तनय तेरा अरे किस वेष में है
पिता कहता कुपित होकर कलंकित वह समूचे देश में है
मिली अब धूल में इज्जत कि सपने चूर होते हैं
न देना जन्म ऐसे पुत्र को जो क्रूर होते हैं
आशाएँ लुट गई, धज्जियाँ अरमानों की उड़ी हाय
गर्दन की क्या मोल रह गयी जब बेटा ही बन गया कसाय
अरमानों के शीश-महल में बेबस माँ औ बाप बेचारा
फेंका पत्थर चूर हुआ सब, कर गुजरा बेटा आवारा…….!!
*** डॉ.मधेपुरी की कविता ***