Poem-Insani Lash

देखो !

सीमावर्ती गांव के पास

मैदान में वह-

ना तो मिट्टी का ढूह है

ना लकड़ी का ढेंग

और ना ही ढेर है सूखी घास का –

वह तो एक ढेर है

फ़क़त इंसानी लाश का ……….|

अरे यह लाश !

महात्मा गाँधी की है

देखते नहीं

तीन गोलिओं के निशान

मानवता के सौभाग्य

एकता 

स्नेह

सदभाव

की पहचान !

अब भी छिपा है इन लाशों में

हमारे जीवन का सन्देश………

इन्हे

नमन करो……!

नमन करो ……..!!

घृणा !

विद्वेष !!

आतंकवाद !!!

इनका

शमन करो…..!

शमन करो …….!!

*** डॉ.मधेपुरी की कविता ***