देखो !
सीमावर्ती गांव के पास
मैदान में वह-
ना तो मिट्टी का ढूह है
ना लकड़ी का ढेंग
और ना ही ढेर है सूखी घास का –
वह तो एक ढेर है
फ़क़त इंसानी लाश का ……….|
अरे यह लाश !
महात्मा गाँधी की है
देखते नहीं
तीन गोलिओं के निशान
मानवता के सौभाग्य
एकता
स्नेह
सदभाव
की पहचान !
अब भी छिपा है इन लाशों में
हमारे जीवन का सन्देश………
इन्हे
नमन करो……!
नमन करो ……..!!
घृणा !
विद्वेष !!
आतंकवाद !!!
इनका
शमन करो…..!
शमन करो …….!!
*** डॉ.मधेपुरी की कविता ***