Dhan ki Bhukh

 

धन है क्या चीज़ ?

धन वही है जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपने निधन तक इकट्ठा करने में लगा रहता है | उसके लिए परेशान रहता है….. काग-चेष्टा और बकोध्यान लगाकर सतत प्रयत्नशील रहता है……. अहर्निश जगा रहता है |

धन की भूख ऐसी होती है कि उसके आगे संतों, ऋषियों एवं मुनियों द्वारा कहे गये सारे उपदेश व प्रवचन अर्थहीन हो जाते हैं, बल्कि कठोरतापूर्वक दो टुक कहने वाले महात्मा कबीर का यह वचन भी बेअसर हो जाता है-

साईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय !

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय !!

विश्वविजेता सिकंदर ने भी तो दुनिया को अलविदा कहने से पूर्व बस इतना ही कहा था-

“मेरे मरने के बाद मेरे दोनों हाथों को कफन से बाहर निकाल देना ताकि दुनिया यह देख ले कि विश्वविजेता सिकन्दर भी दुनिया से कुछ लेकर नहीं बल्कि सबकुछ यहीं छोड़कर बिल्कुल खाली हाथ जा रहा है…….!”

और अंत में मैं डॉ.मधेपुरी…… आपका मित्र, बंधु, सखा व सहचर बनकर विनम्रतापूर्वक इस बाबत अपनी चार पंक्तियां समर्पित करता हूँ –

“धन आदमी की नींद को हरपल हराम करता,

जो बाँटता दिल खोल उसे युग सलाम करता |

मरने के बाद मसीहा बनता वही मधेपुरी,

जो जिंदगी में अपना सबकुछ नीलाम करता ||”