आजादी की जंग से भीषण है
कोरोना से लड़ना और जीतना
कभी देश की आजादी के लिए
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
साथ मिलकर लड़े और जीते
पर जब बंटे तो सरहदों में सिमट गए
अनगिनत जख्मों में दर्ज है
बंटवारे की दास्तान
आज जबकि कोरोना नाम के शत्रु से
एक साथ जूझ रहे हैं सारे देश
और धाराशायी हो रही हैं महाशक्तियां
हम अब भी यहां देख रहे हैं कोरोना को
मजहबी चश्मे से
तब्लीगी जमात से जोड़ रहे हैं उसका रिश्ता
कटरा में जमा
माता वैष्णो के भक्तों को हम
लॉकडाउन में फंसा हुआ कहते हैं
और मरकज में जुटे लोगों से
साजिश की बू आती है हमें
आखिर क्यों अपनों की ओर ही
उंगली उठा रहे हैं हम
किस धर्म ने सिखाया कि
मानवता से ऊंची हैं उसकी दीवारें
जब हम ही नहीं बचेंगे
कौन आएगा धर्म का झंडा उठाने
कोरोना का कोई मजहब नहीं
चीन से निकले इस दानव के पंजों में
पूरी मानवता कराह रही है आज
हम बंटेंगे तो मिट जाएंगे
मिलकर रहें तभी लड़ पाएंगे
बस सब कुछ भूल सारी ऊर्जा को हमें
इस दानव को मिटाने में लगाना है
अपने-अपने घरों में रहकर सुरक्षित
कोरोना से अपना संसार बचाना है
*** डॉ.मधेपुरी की कविता ***