Bhukh Poem

भूख   भयानक   रोग   मनुज   पर
अपनी     सदा     कहर    बरपाती
कृषक   खेत    में   बीज    डालता
माँ   उस   दाने   को   चुन    लाती

ज्वालामुखी      भूख     के    आगे
कोई    यहाँ   न   टिक   पाता   है
श्वपच   श्वान    के    संग    बैठकर
जहाँ     तहाँ     जूठन    खाता   है

बच्चों    की   भूख    मिटाने    को
माँ    जिस्म    बेचने   लगती     है
जगता  जब  मन   में   स्वाभिमान
अन्तर    में    आग    दहकती   है

साथी    भूख   अनेक    धरा   पर
इज्जत   शोहरत   काम    नाम  है
किन्तु   पेट   की    भूख   बंधुओ !
जलती   हर   दिन  सुबह  शाम है

रे     एक     भूख    है   सर्वोत्तम
निज     अंतर्कोष     लुटा     देना
वह   भूख   कदापि  न  मंगलमय
परधन  से   निज घर   भर   लेना

भूख ! दनुज यह सतत मनुज का
मरने   तक    पीछा    करता  है
भिन्न   विधाएँ   बाढ़    भूख  की
शासक  भी  न  रोक  सकता  है

है  समय   कहाँ  रे   शासक  को
वह   तो  अपनों   में  मगन  सदा
जीवन    की    सुविधाएँ     बटोर
छूता    धरती   से     गगन   सदा

की   जाय   अपेक्षा    क्या   बोलो
इस  गगन  बिहारी  शासक  से ?
अवगत      भूखी   प्यासी    जनता
इसके      मायावी      नाटक   से

*** डॉ.मधेपुरी की कविता ***