कि खेले खून से होली बहुत विश्राम तो लो
लहू से सिक्त कर धो कर भला कुछ काम तो लो
गिरा दो जातियों के बीच की दीवार को तुम
कि मंजिल तक पहुँचने का नया पैगाम तो लो
कि मुट्ठी बाँध कर आये जरा तुम ख्याल कर लो
पसारे कर विदा होगे इसे भी याद कर लो
अरे धन लूटने की लालसा तो व्यर्थ है सब
निछावर लोकहित कर स्वयं को आबाद कर लो
कि जीवन कर्म से बनता बिगड़ता द्वेष में है
अमन मिटता प्रपंचों में कलह औ’ क्लेश में है
क्रिया को छोड़ चिन्तन में कभी फँसना नहीं तुम
डुबोने मनुज को फिरता दनुज हर वेश में है
विकल है रुग्न सारा देश टूटा जा रहा है
धरा का सुख सुरभि सौंदर्य लूटा जा रहा है
मनुज निष्प्राण जिसके रुधिर में उष्मा नहीं अब
नयन मन में सतत अविरल अंधेरा छा रहा है
तिमिर को बेध उज्जवल सूर्य का आलोक लाओ
कि सदियों से मनुज जो सुप्त है उसको जगाओ
नये इस राष्ट्र के निर्माण में हम सब जुटेंगे
कि पहले हृदय से छल – बल कपट – मत्सर भगाओ
*** डॉ.मधेपुरी की कविता ***